धोरीमना 1 अगस्त। आलम नगरी धोरीमन्ना में श्री षान्तिनाथ प्रवचन हाल में वसीमालाणी रत्नषिरोमणि आचार्य प्रवर श्री जिन मनोज्ञसूरीश्वरजी म.सा. व नयज्ञसागर जी म.सा. व साध्वी जयरत्ना श्री जी म.सा. की पावन निश्रा में चल रहे चातुर्मास के दौरान दैनिक प्रवचन माला में रविवार को आचार्य प्रवर श्री जिन मनोज्ञसूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में आराधकों सम्बोधित करते हुए कहा कि जिस राष्ट्र में सद् ग्रंथ साहित्य और सद्गुरु ना हो वह राष्ट्र भ्रष्ट कहलाता है दुखी कहलाता है उन राष्ट्रों में समन्वयता और सहिष्णुता का भाव नहीं होता। ठीक उसी प्रकार ही जिस समाज में संत और सद् साहित्य ना हो तो वह कभी भी उन्नति नहीं कर पाता। यह आगमवाणी धोरीमन्ना में चातुर्मास के लिए विराजित आचार्य प्रवर श्री जिन मनोज्ञसूरीश्वर जी म.सा. ने प्रवचन की श्रृंखला में फरमाया आज हमारा राष्ट्र आर्यभूमि कहलाता है आर्य अर्थात संत । संतो महापुरुषों शास्त्रविदो के द्वारा रचित साहित्य अच्छे ग्रंथ जो गौरव को बढ़ाने में और आत्म उन्नति करने में बहुत सहायक है धर्म बिंदु ग्रंथ केवल मात्र धर्म की एक छोटी सी बूंद है जैसे बाल्टी भर पानी में एक छोटा सा कपूर का टुकड़ा डालने से वह सुगंधित हो जाती है वैसे ही धर्म हमारे विचार आचरण में रम जाए तो जीवन में हम जैसा सुखी कोई नहीं हो सकता।यह चातुर्मास का समय काल आराधना साधना का समय लेकर आया है जो जीवन का उद्धार करने में महत्वपूर्ण है धर्म अर्थात जो धारण कराए आत्मा के स्वभाव को धारण करना। क्रोध आदि छल कपट राग द्वेष आदि आत्मा का स्वभाव नहीं है हम इसके चपेट में आकर अपने मूल स्वरूप को भूल गए हैं हमें चेहरा नहीं स्वरूप देखना है उस स्वरूप में जो रूप है उसे देखना है जिस प्रकार माता-पिता उपकारी है हम उनके कर्ज कर्जदार हैं ठीक उसी तरह परमात्मा गुरु का हमारे ऊपर कर्ज है उसे धर्म आराधना प्रवचन श्रवण स्वाध्याय तपस्या संयम भावना रखकर हमें कर्ज चुकाना है अगर हमारी चिंतन में किसी भी प्रकार की समझने की ललक ना हो तो हमें आगे का रास्ता कैसे प्राप्त होगा। चिंतन की चांदनी को उजाला करने के लिए महापुरुषों ने हमे ग्रंथ साहित्य में दिया है। कहते हैं पत्थर तोड़ना,पत्थर उठाना,पैदल चलना सरल है पर धर्म आराधना सद् साहित्य का वांचन करना बहुत कठिन है परमात्मा महापुरुषों की वाणी को सुनने के लिए विचारों की भागदौड़ को दूर करना पड़ेगा। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म में जिज्ञासा रखना ही जीवन को सफल बनाता हैं। दिमाग को खाली और मन को स्थिर करना पड़ेगा। श्री शान्तिनाथ जैन श्री संघ धोरीमन्ना के उपाध्यक्ष नेमीचन्द कोठाला ने बताया कि आलम नगरी धोरीमन्ना में इस बार चातुर्मास में चार माह धर्म की गंगा बहेगी। जिसमें चातुर्मास आराधना की तपस्या की कड़ी में रविवार को 50 दिवसीय पर्व में पंच परमेष्ठी श्रेणिक तप की आराधना का दूसरा चरण पूरा हुआ। सोमवार से तीसरा चरण प्रारंभ होगा। सांकलिया तेला और आयंबिल तप नियमित जारी है। रविवार को 150 की संख्या में दीपक एकासणा का तप हुआ, जिसमें महिलाओं और बच्चों ने बढ चढ कर भाग लिया। रविवार को कारोला जैन श्री संघ व बाड़मेर केयुप शाखा व जैन श्री संघ राणीगांव, बालोतरा से गुरूभक्त पधारें, जिनका श्री शान्तिनाथ जैन श्री संघ की और स्वागत व अभिनन्दन किया और कई जैन संघ से गणमान्य गुरूभक्तों ने भी धोरीमना पहुंच कर गुरूदेव के दर्शन किए।
धर्म में जिज्ञासा रखना जीवन को सफल बनाता हैं: आचार्य श्री जिनमनोज्ञसूरि
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August 01, 2021
धोरीमना 1 अगस्त। आलम नगरी धोरीमन्ना में श्री षान्तिनाथ प्रवचन हाल में वसीमालाणी रत्नषिरोमणि आचार्य प्रवर श्री जिन मनोज्ञसूरीश्वरजी म.सा. व नयज्ञसागर जी म.सा. व साध्वी जयरत्ना श्री जी म.सा. की पावन निश्रा में चल रहे चातुर्मास के दौरान दैनिक प्रवचन माला में रविवार को आचार्य प्रवर श्री जिन मनोज्ञसूरीश्वरजी म.सा. ने प्रवचन में आराधकों सम्बोधित करते हुए कहा कि जिस राष्ट्र में सद् ग्रंथ साहित्य और सद्गुरु ना हो वह राष्ट्र भ्रष्ट कहलाता है दुखी कहलाता है उन राष्ट्रों में समन्वयता और सहिष्णुता का भाव नहीं होता। ठीक उसी प्रकार ही जिस समाज में संत और सद् साहित्य ना हो तो वह कभी भी उन्नति नहीं कर पाता। यह आगमवाणी धोरीमन्ना में चातुर्मास के लिए विराजित आचार्य प्रवर श्री जिन मनोज्ञसूरीश्वर जी म.सा. ने प्रवचन की श्रृंखला में फरमाया आज हमारा राष्ट्र आर्यभूमि कहलाता है आर्य अर्थात संत । संतो महापुरुषों शास्त्रविदो के द्वारा रचित साहित्य अच्छे ग्रंथ जो गौरव को बढ़ाने में और आत्म उन्नति करने में बहुत सहायक है धर्म बिंदु ग्रंथ केवल मात्र धर्म की एक छोटी सी बूंद है जैसे बाल्टी भर पानी में एक छोटा सा कपूर का टुकड़ा डालने से वह सुगंधित हो जाती है वैसे ही धर्म हमारे विचार आचरण में रम जाए तो जीवन में हम जैसा सुखी कोई नहीं हो सकता।यह चातुर्मास का समय काल आराधना साधना का समय लेकर आया है जो जीवन का उद्धार करने में महत्वपूर्ण है धर्म अर्थात जो धारण कराए आत्मा के स्वभाव को धारण करना। क्रोध आदि छल कपट राग द्वेष आदि आत्मा का स्वभाव नहीं है हम इसके चपेट में आकर अपने मूल स्वरूप को भूल गए हैं हमें चेहरा नहीं स्वरूप देखना है उस स्वरूप में जो रूप है उसे देखना है जिस प्रकार माता-पिता उपकारी है हम उनके कर्ज कर्जदार हैं ठीक उसी तरह परमात्मा गुरु का हमारे ऊपर कर्ज है उसे धर्म आराधना प्रवचन श्रवण स्वाध्याय तपस्या संयम भावना रखकर हमें कर्ज चुकाना है अगर हमारी चिंतन में किसी भी प्रकार की समझने की ललक ना हो तो हमें आगे का रास्ता कैसे प्राप्त होगा। चिंतन की चांदनी को उजाला करने के लिए महापुरुषों ने हमे ग्रंथ साहित्य में दिया है। कहते हैं पत्थर तोड़ना,पत्थर उठाना,पैदल चलना सरल है पर धर्म आराधना सद् साहित्य का वांचन करना बहुत कठिन है परमात्मा महापुरुषों की वाणी को सुनने के लिए विचारों की भागदौड़ को दूर करना पड़ेगा। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म में जिज्ञासा रखना ही जीवन को सफल बनाता हैं। दिमाग को खाली और मन को स्थिर करना पड़ेगा। श्री शान्तिनाथ जैन श्री संघ धोरीमन्ना के उपाध्यक्ष नेमीचन्द कोठाला ने बताया कि आलम नगरी धोरीमन्ना में इस बार चातुर्मास में चार माह धर्म की गंगा बहेगी। जिसमें चातुर्मास आराधना की तपस्या की कड़ी में रविवार को 50 दिवसीय पर्व में पंच परमेष्ठी श्रेणिक तप की आराधना का दूसरा चरण पूरा हुआ। सोमवार से तीसरा चरण प्रारंभ होगा। सांकलिया तेला और आयंबिल तप नियमित जारी है। रविवार को 150 की संख्या में दीपक एकासणा का तप हुआ, जिसमें महिलाओं और बच्चों ने बढ चढ कर भाग लिया। रविवार को कारोला जैन श्री संघ व बाड़मेर केयुप शाखा व जैन श्री संघ राणीगांव, बालोतरा से गुरूभक्त पधारें, जिनका श्री शान्तिनाथ जैन श्री संघ की और स्वागत व अभिनन्दन किया और कई जैन संघ से गणमान्य गुरूभक्तों ने भी धोरीमना पहुंच कर गुरूदेव के दर्शन किए।
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